Monday, November 21, 2011

Total Satisfaction

एक सूफी फकीर के संबंध में मैंने सूना है। उसके मरने के दिन करीब थे। रहता तो एक छोटे झोंपड़े में था। लेकिन एक बड़ा खेत और एक बड़ा बग़ीचा भक्‍तों ने उसके नाम कर रखा था। मरने के कुछ दिन पहले उसने कि अब मैं मर जाऊँगा। ऐसे तो जिंदा में भी इस बड़ी जमीन की मुझे कोई जरूरत नही थी। वह झोंपड़ा काफी था, और मर कर तो मैं क्‍या करूंगा। मर कर तो मुझे तुम इस झोंपड़े में दफ़ना देना। यह काफी है। तो उसने एक तख्‍ती लगवा दी पास के बग़ीचे पर की जो भी व्‍यक्‍ति पूर्ण संतुष्‍ट हो, उसको मैं यह बग़ीचा भेंट करना चाहता हूं।
अनेक लोग आये;लेकिन खाली हाथ लोट गये। खबर सम्राट तक पहुंची। एक दिन सम्राट भी आया। और सम्राट ने सोचा कि औरों को लोटा दिया, ठीक; मुझे क्‍या लौटायेगा। मुझे क्‍या कमी है। मैं तो पूर्ण संतुष्‍ट हूं। सब जो चाहिए वो है मेरे पास। मेरे संतोष में वह कोई खोट नहीं निकाल पायेगा। सम्राट भीतर गया। और फकीर से कहा कि क्‍या ख्‍याल है मेरे विषय में। अनेक लोगों को लोटा चुके हो। सब लोगों में संतोष की कमी मिली। अब मेरे विषय में आपकी क्‍या राय है। में चल कर आया हूं आपकी शर्त सून कर।
तो उस फकीर ने कहा कि अगर तुम संतुष्‍ट थे तो आए ही क्‍यो? तो उसके लिए है जो आएगा ही नहीं; और मैं उसके पास जाऊँगा। अभी वह आदमी इस गांव में नहीं है। वह यहां है ही नहीं। वह क्‍यों आयेगा।
एक ऐसा संतोष का क्षण भीतर घटित होता है। जब आपकी कोई अपनी चाह नहीं होती। दौड़ नहीं होती। और आप अपने साथ राज़ी होते है। उस क्षण में परमात्‍मा आता है। आपको उसके द्वार पर मांगने नही जाना पड़ता। उस दिन उसकी मीठी वर्षा आपके उपर होती है। वही निर्वाण है।
ओशो
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Tuesday, November 15, 2011

देउता भनि पूजेको थिए

देउता भनि पूजेको थिए,
ढुंगा पो निकलियौ ।
आफ्नो भनि मानेको थिए,
पराए पो रहेछौ ।
तिमि खूसी हुदा,
संसार नै खूसी छ भनि मानेको थिए ।
तिमि ढुखी हुदा,
म नै ढुखी छु कि भनि मानेको थिए ।।
जुन मुटुमा सजाएकी थिए,
तेसैमा छुरा घोपी घाईते बनाई गयौ ।
सपना हो कि भनि मान्छु आझै पनि,
बिपनामा पनि झस्किन्छु सम्जी तिमि ।
अनुग्रह छ तिमि प्रति जीवन भरि,
भुझाई दियौ जिन्दगीको पाठ छ्ण भरि ।।

Monday, November 14, 2011

अबुझ यात्री


तिमीलाई थाहा छैन
म कुनै पात्र होइन
म कुनै यथार्थ होइन
म मौनता मा डुबेकी,
जीवनका बाटाहरुमा
निशब्द हिडिरहेकी,
अबुझ यात्री हु म
हल्लाहरुले छुदैन मलाई,
मानिसहरु को भिडमा पनि
एक्लिएकी हुन्छु  म
संसारको बदलिएको
आभाष भएको थियो,
संसार त उही हो
मान्छे पो बदलिए छ
भगवान जीवन त दीयौ,
जीउने कसरी ?
त्यो मेरै हातमा छ
खुसि पनि हुन सक्छु
ढुखी पनि हुन सक्छु
अनुभवको सागर थुप्रिदै छ
जिन्दगी पनि सरल र
स्वछयताका साथ
बग्दै गएको छ.........

Friday, November 4, 2011

समर्पण.....

......अभी कुछ दिन पहले मेरा जर्मन संन्यासी, विमल कीर्ति, संसार से विदा हुआ. उसने अपनी ...आखिरी कविता जो मेरे लिए लिखी, उसमे कुछ प्यारे वचन लिखे थे. विमल कीर्ति यूं तो राज-परिवार से था. करीब-करीब यूरोप के सारे राज-परिवारों से उसके सम्बन्ध थे. उसकी मां है ग्रीस की महारानी की बेटी. उसकी दादी है ग्रीस की महारानी. उसकी मौसी है स्पेन की महारानी. उसके मां के भाई हैं प्रिंस फिलिप, एलिजाबेथ के पति इंग्लैंड के. एलिजाबेथ, इंग्लैंड की महारानी उसकी मामी. प्रिंस वेल्स उसके ममेरे भाई. उसकी मां ने यह दूसरी शादी की हनोवर के राजकुमार से, जिनसे विमल कीर्ति का जन्म हुआ. उसकी पहली शादी, विमल कीर्ति की मां की, हुई थी डेनमार्क के महाराजा से. तो डेनमार्क के महाराजा और डेनमार्क के महाराजा के जितने संबंधी हैं, उनसे भी विमल कीर्ति का सम्बन्ध. मुश्किल होगा एक आदमी ऐसा खोजना जिसका यूरोप के सारे राज-परिवारों से सम्बन्ध है. और जर्मन सम्राट का तो वह बंशज है ही.

अगर जर्मन साम्राज्य बचा रहता तो विमल कीर्ति आज सम्राट होता जर्मनी का. आया था भारत में यूं ही भ्रमण के लिए. सोचा भी न होगा की मुझसे मिलना हो जायेगा. इधर मुझसे मिलना हो गया तो लौटा ही नहीं. और उसका समर्पण समर्पण कहा जा सकता है. वर्षों तक तो यह पता ही नहीं चला किसी को की वह इतने साम्राज्यों से सम्बंधित है. किसी को पता ही नहीं चला. किसी को उसने कभी कहा ही नहीं. यहाँ उसने कोई ऐसा काम नहीं जो न किया हो. बागवानी का काम किया, बुहारी लगाने का काम किया. जो काम उसको दे दिया, किया. समर्पण यह था ! कभी एक बार भी यह पता न चलने दिया की मैं राजकुमार हूँ और कभी मेरी पीढ़ियों में किसी ने बुहारी नहीं लगे. बुहारी लगाने की बात ही दूर, बुहारी देखि भी नहीं होगी.

फिर वह मेरा पहरेदार हो गया, मेरे दरवाजे पर पहरा देता था. तब भी उसने नहीं बताया की खुद उसके दरवाजे पर पहरेदार हुआ करते थे. मुझसे न तो उसने कभी कोई प्रश्न पूछा, न मुझे कभी कोई पत्र लिखा. पत्र लिखता भी था तो अपनी डायरी में रखता जाता था. उसके विदा हो जाने के बाद ही उसकी पत्नी तुरिया ने मुझे डायरी दिखाई, जिसमे की वह पत्र रखता जाता था. और मुझे इसलिए नहीं भेजता क्योंकि उसका कहना था की आज नहीं कल मैं उत्तर दे ही देता हूँ, तो क्यों नाहक भेजना, क्यों परेशान करना ! अपना पत्र लिख रख लेता हूं की यह मेरा प्रश्न है, ताकि मैं भूल न जाऊं. उत्तर तो आ ही जाता है, देर-अबेर. जब मेरी जरुरत होती है, उत्तर आ जाएगा.

आखिरी पत्र उसने जो मुझे लिखा है- वह भी मुझे भेजा नहीं था- उसमे उसने लिखा है की मैंने कभी सोचा भी न था की जीवन में इतना आनंद भी हो सकता है. और मेरे सर्वाधिक आनंद के वे क्षण हैं जब मैं, आप दरवाजे के बहार निकलते हैं और आपके परदे के बाहर पहरा देता हूं और आपके पैरों की आहट सुनता हूं. बस आपके पैरों की आहट मेरा सबसे बड़ा आनंद है. मुझे सब मिल जाता है.

वह परदे के बाहर होता था, तो मैं तो उसे दिखाई पड़ता नहीं था, एक कमरे से मैं दुसरे कमरे में जाऊं तो मैं उसे दिखाई नहीं पड़ता था, लेकिन मेरे पैरों की आहट उसे सुनाई पडती थी. वह कहता था: चौबीस घंटे भी मैं वहां बैठा रह सकता हूं, बस दिन में दो बार आपके पैरों की आहट सुनाई पड़ जाती है, और मैंने सब पा लिया ! इसे कहते हैं समर्पण.


-ओशो { आपुई गई हिराय }

Thursday, November 3, 2011

गंगालाई सोधे...

गंगालाई सोधे...
कहाँ तिम्रो गन्तब्य हो भनेर
सागरनै हो मेरो प्रियत्मा भनेर,
खोजीमा आफ्नो प्रियत्मालाइ,
चिर्दै जान्छिंन हिमाल पहाड कन्दरा,
सागर तिमि जतिनै टाढा भएपनि,
सागर तिमि जतिनै गहिराइमा भएपनि,
पुगीहाल्छु तिमि सामु जसरि भएपनि।


चादनीलाई सोधे...
तिमीमा किन दाग भनेर?
मुहारमा जतिनै दाग भएपनि,
मन त छ उज्यालोनै उज्यालो भनेर।
मुहारको उज्यालोत मेटिन्छ क्षणभरमा,
मन को उज्यालो ले साथ दिन्छ जीवन भरमा।।

धर्तिलाई सोधे...
पीडा किन यति सहन्छेउ यति भनेर ?
नसहे पीडा चल्दैन जीवनको बीणा ।
गाउदैनन् चराचुरुंगी, फुल्दैनन फुलबिरुवा,
नाच्दैनन मजुर बनमा, हास्दैनन हिमाल पहाडमा,
पीडा सहेर दिन्छु, मुस्कान सबै को मुहारमा।।






आमालाई सोधे...
तिमि यति ममतामै किन भनेर ?
नौ महिना गर्भमा राखेर, खून पसिनाले सीचेर
भुलिदेउ कसरि निस्टुरी बनेर
आमा नै ममता हो, ममता नै आमा हो
येही भन्ने बुजेर....

Tuesday, November 1, 2011

खोज्दै हिडे तिमीलाई...


Searching day & night.


Searching...

खोज्दै हिडे तिमीलाई,
दिन मा पनि खोजे,
रातमा पनि खोजे ।
खोज्दा खोज्दै तिमीलाई,
म आफ्फै नै हराएकी छु।
मलाई नै थाहा छैन,
म कहाँ छु, म कता छु ?
जे खोज्दै छु,
त्यो त पाउन सकिन।
मलाई नै थाहा छैन
नाम के हो ?
ठेगाना कहाँ हो ?
मेरो आफ्नै भनेर...

My Arts Clollection - The colours of life

You have colorful life like Nature- Just , Just identified and put the paint in your life canvas :-)