Friday, November 4, 2011

समर्पण.....

......अभी कुछ दिन पहले मेरा जर्मन संन्यासी, विमल कीर्ति, संसार से विदा हुआ. उसने अपनी ...आखिरी कविता जो मेरे लिए लिखी, उसमे कुछ प्यारे वचन लिखे थे. विमल कीर्ति यूं तो राज-परिवार से था. करीब-करीब यूरोप के सारे राज-परिवारों से उसके सम्बन्ध थे. उसकी मां है ग्रीस की महारानी की बेटी. उसकी दादी है ग्रीस की महारानी. उसकी मौसी है स्पेन की महारानी. उसके मां के भाई हैं प्रिंस फिलिप, एलिजाबेथ के पति इंग्लैंड के. एलिजाबेथ, इंग्लैंड की महारानी उसकी मामी. प्रिंस वेल्स उसके ममेरे भाई. उसकी मां ने यह दूसरी शादी की हनोवर के राजकुमार से, जिनसे विमल कीर्ति का जन्म हुआ. उसकी पहली शादी, विमल कीर्ति की मां की, हुई थी डेनमार्क के महाराजा से. तो डेनमार्क के महाराजा और डेनमार्क के महाराजा के जितने संबंधी हैं, उनसे भी विमल कीर्ति का सम्बन्ध. मुश्किल होगा एक आदमी ऐसा खोजना जिसका यूरोप के सारे राज-परिवारों से सम्बन्ध है. और जर्मन सम्राट का तो वह बंशज है ही.

अगर जर्मन साम्राज्य बचा रहता तो विमल कीर्ति आज सम्राट होता जर्मनी का. आया था भारत में यूं ही भ्रमण के लिए. सोचा भी न होगा की मुझसे मिलना हो जायेगा. इधर मुझसे मिलना हो गया तो लौटा ही नहीं. और उसका समर्पण समर्पण कहा जा सकता है. वर्षों तक तो यह पता ही नहीं चला किसी को की वह इतने साम्राज्यों से सम्बंधित है. किसी को पता ही नहीं चला. किसी को उसने कभी कहा ही नहीं. यहाँ उसने कोई ऐसा काम नहीं जो न किया हो. बागवानी का काम किया, बुहारी लगाने का काम किया. जो काम उसको दे दिया, किया. समर्पण यह था ! कभी एक बार भी यह पता न चलने दिया की मैं राजकुमार हूँ और कभी मेरी पीढ़ियों में किसी ने बुहारी नहीं लगे. बुहारी लगाने की बात ही दूर, बुहारी देखि भी नहीं होगी.

फिर वह मेरा पहरेदार हो गया, मेरे दरवाजे पर पहरा देता था. तब भी उसने नहीं बताया की खुद उसके दरवाजे पर पहरेदार हुआ करते थे. मुझसे न तो उसने कभी कोई प्रश्न पूछा, न मुझे कभी कोई पत्र लिखा. पत्र लिखता भी था तो अपनी डायरी में रखता जाता था. उसके विदा हो जाने के बाद ही उसकी पत्नी तुरिया ने मुझे डायरी दिखाई, जिसमे की वह पत्र रखता जाता था. और मुझे इसलिए नहीं भेजता क्योंकि उसका कहना था की आज नहीं कल मैं उत्तर दे ही देता हूँ, तो क्यों नाहक भेजना, क्यों परेशान करना ! अपना पत्र लिख रख लेता हूं की यह मेरा प्रश्न है, ताकि मैं भूल न जाऊं. उत्तर तो आ ही जाता है, देर-अबेर. जब मेरी जरुरत होती है, उत्तर आ जाएगा.

आखिरी पत्र उसने जो मुझे लिखा है- वह भी मुझे भेजा नहीं था- उसमे उसने लिखा है की मैंने कभी सोचा भी न था की जीवन में इतना आनंद भी हो सकता है. और मेरे सर्वाधिक आनंद के वे क्षण हैं जब मैं, आप दरवाजे के बहार निकलते हैं और आपके परदे के बाहर पहरा देता हूं और आपके पैरों की आहट सुनता हूं. बस आपके पैरों की आहट मेरा सबसे बड़ा आनंद है. मुझे सब मिल जाता है.

वह परदे के बाहर होता था, तो मैं तो उसे दिखाई पड़ता नहीं था, एक कमरे से मैं दुसरे कमरे में जाऊं तो मैं उसे दिखाई नहीं पड़ता था, लेकिन मेरे पैरों की आहट उसे सुनाई पडती थी. वह कहता था: चौबीस घंटे भी मैं वहां बैठा रह सकता हूं, बस दिन में दो बार आपके पैरों की आहट सुनाई पड़ जाती है, और मैंने सब पा लिया ! इसे कहते हैं समर्पण.


-ओशो { आपुई गई हिराय }

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